इश्वर की शक्ति है माया । जिसके सहारे वह अपने वास्तविक स्वरुप को आवृत रखते हैं . अद्वैत का यह प्रसिद्द सिद्धांत है .लेकिन मैं समझता हूँ की समस्या माया की नहीं है ,समस्या हमारी चेतना की है . हमारी मूर्छा की है .हमारे भय की है .हम भयभीत होते हैं इसलिए सत्य का अन्वेषण नहीं करना चाहते .हमारी तुच्छता या मामूलीपन ही माया है जिसका स्वामी इश्वर नहीं हमारा मन है .
ऐसी विकट 'कंडिशनिंग' इन्सान को घेर लेती है कि वह इसके जाल से निकलने की सोच भी नहीं पाता ।और तो और अगर उसे सत्य की थोडी झलक भी मिल जाए तो भी उसे अनदेखा कर देता है .
उसे तो बस शरण चाहिए ।अपने खालीपन को भरने के लिए एक भुलावा चाहिए ,फ़िर चाहे वह शरण धर्म की हो या सेक्स की या मनोरंजन की .कुछ और नहीं तो रिश्तों की शरण.मनुष्य अपनी नग्नता से बहुत डरता है .लेकिन कब तक उसके ये छद्म आवरण उसका साथ देंगे ?
एक न एक दिन उसे अपने स्वरुप में आना ही होगा .यह विचार यूटोपिया सा लगता है.लेकिन मुझे चेतना की सामर्थ्य को देखते हुए ऐसा गहराई से महसूस होता है.चेतना के भविष्य में ही आधुनिक मानव का भविष्य है ,शायद तब वह ईश्वर जैसी किसी चीज़ के बारे में अपने बचकाने विचारों से परे कुछ सार्थक सोच सकता है .हो सकता है वह राह ईश्वर की ओर ही ले जाए लेकिन तब वह ज्यादा रौशन होगी .
Wednesday, December 24, 2008
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