Thursday, October 9, 2008

भारतीय षड् दर्शन, हिंदुत्व और आचारशास्त्र

भारतीय दर्शन का एक समूह षड्दर्शन कहलाता है । इसमें शामिल है -न्याय,वैशेषिक,सांख्य,पूर्व मीमांसा ,उत्तर मीमांसा और चार्वाक. एक बहुत विलक्षण बात है षड् दर्शनों में कि इनमें से एक भी आचार संहिता नहीं है । बजाय इसके इनमें मूल दार्शनिक समस्याओं का तार्किक विवेचन है ।

भारतीय विचारधारा की अनमोल विरासत है वेदांत जो कि उत्तर मीमांसा का ही दूसरा नाम है । वेदांत में एक अत्याधुनिक तार्किकता है ।विश्व धर्म बनने की सारी संभावनाएं इसमे मौजूद हैं। लेकिन मैं सत्य की खोज को ही धर्म मानता हूँ । कोई बंधा बंधाया धर्म मुझे स्वीकार नहीं । फ़िर भी अगर सभ्यताओं ने अपने धर्मो का विकास जारी रखा(जो कि धर्म के संस्थागत स्वरुप में कम ही सम्भव है ) तो वेदांत ही धर्म कि उच्चतम अवस्था हो सकता है।अद्वैत धर्म की सीमाओं को संभावनाओं के असीम क्षितिज तक विस्तृत कर देता है ।

कितनी दयनीय स्थिति है न हमारे भारत की ,कि महान दर्शनों की जन्मभूमि आज पुराणों के षड्यंत्रों से हार गई ।
यह हिंदुत्व कि सबसे बड़ी कमजोरी है । मैं पुनः स्पष्ट कर दूँ कि कोई धर्म मेरी श्रद्धा का विषय नहीं है स्वयं हिंदुत्व भी नहीं । लेकिन हिंदुत्व मानव उन्नति का बेहद सक्षम पंथ बन सकता था यदि वेदांत और दर्शन की परम्परा से विमुख न हुआ होता । आज इसे एक बौद्धिक उत्थान की आवश्यकता है ।

एक अच्छी बात यह है कि स्मृतियों का उतना गंभीर प्रभाव नहीं पड़ा जितना पड़ सकता था । नहीं तो यह इतना जड़ हो जाता की सुधार की सारी संभावनाएं विलुप्त हो जाती । क्योंकि स्मृतियाँ आचार शास्त्र हैं जिनमें सामाजिक व्यव्हार और नैतिक नियम निहित हैं । मैं हमेशा से यह मानता आया हूँ की सामाजिक आचरण समय की जरूरत के अनुसार परिवर्तित होते रहना चाहिए । इन्हें ईश्वरीय आदेश मानने से धर्म में सड़न पैदा हो जाती है ।

सनातन धर्म के अलावा सारे धर्मो का या तो तात्कालिक प्रयोजन रहा है या किसी एक पैगम्बर के आस पास घूमते रहे हैं ,लेकिन सनातन धर्म का सत्य के अलावा कोई दूसरा उद्देश्य नहीं रहा है। न ही यह किसी एक महापुरुष की देन है । यह तो सत्य के प्यासे मनीषियों का सम्मिलित प्रयास है । एक विकलता भरी प्रार्थना है ।

Tuesday, October 7, 2008

पुरूष का प्रेम और स्त्री की कामना



आदम और हव्वा के दृष्टान्त से पता चलता है कि स्त्री और पुरूष हमेशा से ही अलग विशेषताओं वाले रहे हैं। पुरूष की लम्पटता हमेशा कुख्यात रही है ,लेकिन स्त्री क्या है यह एक बेहद विवाद्दस्पद प्रश्न है। एक अजीब लेकिन दिलचस्प सा रहस्य का आवरण है उसके चारों ओर। स्त्री की कामना को कभी बहुत बढ़ा चढाकर पेश किया जाता है तो कभी पाकीजगी की चादर में ढँक कर
पुरूष स्वछन्द रह सकता है। उसकी स्वभावगत आक्रामकता उसे अक्सर ज़ाहिर कर देती है लेकिन स्त्री के साथ ऐसा नही है कौन समझेगा त्रिया चरित्र?सुना है औरत का ह्रदय अथाह सागर जैसा होता है जिसमें जाने कितने राज़ दफन रहते हैं
लेकिन जहाँ तक यौन संबंधों कि बात है पुरूष निर्दोष ही बना रहता है, आँचल औरत का ही मैला होता है ।पुरूष की अपार लम्पटता देखें , पत्नी उसकी निजी संपत्ति है लेकिन पराई स्त्रियों से रोमांस उसका अनन्य अधिकार है हालाँकि इस तरह का कोई भी 'अधिकार' व्यवहार में 'अनन्य' नहीं हो सकता,क्योंकि दूसरे पुरूष कहाँ जायेंगे?

स्त्री का ह्रदय जाने कितनी कल्पनाएँ करता है लेकिन वह किसी से कहती नहीं ,अपनी विश्वसनीय सखी से भी नहीं ।कामुकता का कोई मीटर तो होता नहीं और ही शोध इस बात को प्रमाणित करते है कि स्त्री कि कामुकता पुरूष से ज्यादा होतो है ,लेकिन कुछ ग्रंथों में (अप्रमाणिक रूप से )इसे सात या शायद कहीं पर सत्तर गुनी कहा गया है ।मैं समझता हूँ ऐसा इसलिए है कि पुरूष अपनी 'आदर्श नारी' को पहल करते हुए या अपने से ज्यादा उन्मादित नहीं देख सकता उसे एक तीव्र भय सताने लगता है कि कहीं स्त्री का ये उन्माद उसकी(पुरूष की) संतुष्ट करने की क्षमता से परे निकल जाए इसलिए वह इस तरह की तमाम बातें गढ़ लेता है।
अभी एक अध्ययन में यह पता चला है कि पुरुषों के मुकाबले महिलाएं पॉर्न सर्फिंग(अश्लील वेबसाइट देखना) बहुत कम करती हैं इससे तो यही ज़ाहिर होता है कि एकांत में भी जब महिलाएं अपनी स्वाभाविकता में होती हैं तब भी पुरुषों के मुकाबले ज्यादा सहज और कम आतुर होती हैं
स्त्री का प्रेम स्वाभाविक ममत्व लिए होता है। एक बलिष्ठ समृद्ध और खूबसूरत नौजवान जहाँ उसके मन में उमंगें पैदा करता है वहीँ दूसरी तरफ़ वह वफ़ा और समर्पण करने वाले साधारण शक्ल सूरत वाले प्रेमी को खुशी से अपना लेती है।पुरूष को ऐसा करने में अतिरिक्त प्रयास करना पड़ता है,वह सौंदर्य का उपासक होता है लेकिन बौद्धिक प्रेम के मामले में स्त्री पीछे रह जाती है ।पुरूष का प्रेम ज्यादा सघन (intense)होता है ,मैं ऐसा समझता हूँ स्त्री स्टिमुलेशन पर चलती है ,यानि अन्दर से आने वाली भावनाओं से ।उत्तेजना में उसका प्रेम ज्यादा उमड़ता है। लेकिन पुरूष में प्रेम की अनवरत मिठास हमेशा रहती है स्त्री का प्रेम सुरक्षा की भावना से ज्यादा जुड़ा रहता है ,लेकिन पुरूष विशुद्ध प्रेम की छाँव चाहता है पुरूष का प्रेम उसे बुद्ध जैसा तपस्वी बना देता है। ..............
यह अपार करुणा से उत्पन्न हुआ प्रेम नहीं तो और क्या है जिसने एक राजकुमार को सत्य की खोज की निर्मम राह पर अग्रसर किया ।उस 'निर्ममता' में कितना प्रेम था! बात कुछ विषय से हटती हुई सी मालूम होती है लेकिन ज़रा गौर से सोचें क्या स्त्री का प्रेम कभी इतनी ऊंचाई पर पहुँच सकता
है ?