भारतीय दर्शन का एक समूह षड्दर्शन कहलाता है । इसमें शामिल है -न्याय,वैशेषिक,सांख्य,पूर्व मीमांसा ,उत्तर मीमांसा और चार्वाक. एक बहुत विलक्षण बात है षड् दर्शनों में कि इनमें से एक भी आचार संहिता नहीं है । बजाय इसके इनमें मूल दार्शनिक समस्याओं का तार्किक विवेचन है ।
भारतीय विचारधारा की अनमोल विरासत है वेदांत जो कि उत्तर मीमांसा का ही दूसरा नाम है । वेदांत में एक अत्याधुनिक तार्किकता है ।विश्व धर्म बनने की सारी संभावनाएं इसमे मौजूद हैं। लेकिन मैं सत्य की खोज को ही धर्म मानता हूँ । कोई बंधा बंधाया धर्म मुझे स्वीकार नहीं । फ़िर भी अगर सभ्यताओं ने अपने धर्मो का विकास जारी रखा(जो कि धर्म के संस्थागत स्वरुप में कम ही सम्भव है ) तो वेदांत ही धर्म कि उच्चतम अवस्था हो सकता है।अद्वैत धर्म की सीमाओं को संभावनाओं के असीम क्षितिज तक विस्तृत कर देता है ।
कितनी दयनीय स्थिति है न हमारे भारत की ,कि महान दर्शनों की जन्मभूमि आज पुराणों के षड्यंत्रों से हार गई ।
यह हिंदुत्व कि सबसे बड़ी कमजोरी है । मैं पुनः स्पष्ट कर दूँ कि कोई धर्म मेरी श्रद्धा का विषय नहीं है स्वयं हिंदुत्व भी नहीं । लेकिन हिंदुत्व मानव उन्नति का बेहद सक्षम पंथ बन सकता था यदि वेदांत और दर्शन की परम्परा से विमुख न हुआ होता । आज इसे एक बौद्धिक उत्थान की आवश्यकता है ।
एक अच्छी बात यह है कि स्मृतियों का उतना गंभीर प्रभाव नहीं पड़ा जितना पड़ सकता था । नहीं तो यह इतना जड़ हो जाता की सुधार की सारी संभावनाएं विलुप्त हो जाती । क्योंकि स्मृतियाँ आचार शास्त्र हैं जिनमें सामाजिक व्यव्हार और नैतिक नियम निहित हैं । मैं हमेशा से यह मानता आया हूँ की सामाजिक आचरण समय की जरूरत के अनुसार परिवर्तित होते रहना चाहिए । इन्हें ईश्वरीय आदेश मानने से धर्म में सड़न पैदा हो जाती है ।
सनातन धर्म के अलावा सारे धर्मो का या तो तात्कालिक प्रयोजन रहा है या किसी एक पैगम्बर के आस पास घूमते रहे हैं ,लेकिन सनातन धर्म का सत्य के अलावा कोई दूसरा उद्देश्य नहीं रहा है। न ही यह किसी एक महापुरुष की देन है । यह तो सत्य के प्यासे मनीषियों का सम्मिलित प्रयास है । एक विकलता भरी प्रार्थना है ।
Thursday, October 9, 2008
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