Friday, July 31, 2009

लिंग पूजा,शिवलिंग और कुण्डलिनी शक्ति .

अधिकांश हिन्दुओं की तरह मैं भी खुद को लिंग पूजक नहीं मानता हूँ .फिर भी जब कभी किसी शिव मंदिर में जाता हूँ तब शिवलिंग को ही प्रणाम करता हूँ .बहुत दिनों के अनुसन्धान के बाद मेरे समक्ष कुछ बेहद दिलचस्प तथ्य उभरकर आये .उनसे तीन महत्वपूर्ण अवधारणाओं का पता चलता है .
१-शिवलिंग लिंग है
२-शिवलिंग लिंग नहीं है .
३-शिवलिंग कुण्डलिनी का प्रतीक है .


भारतीय उपमहाद्वीप में हड़प्पा सभ्यता और संभवतः उसके भी बहुत पूर्व से लिंग की पूजा की जाती रही है .संभवतः शिव सबसे प्राचीन देवता हैं जो एक साथ वैदिक और अवैदिक दोनों हैं .जैसा की हम देखते है की बाद में लिंग को शिव से और फिर शिव का रुद्र से साम्य कर दिया गया .बाद में रुद्र के स्थान पर शिव शब्द का ही प्रयोग होने लगा .
अब यहाँ तादात्म्य तो स्थापित हो गया लेकिन आज एक आम हिन्दू शिवलिंग को लिंग न मानकर 'शिव का प्रतीक' ही मानता है .संस्कृत के लिंग का अर्थ भी प्रतीक ही होता है .जैसे इस नाम को ही ले 'रामलिंग स्वामी '. दक्षिण के इस नाम का उत्तर भारत के रामस्वरूप से साम्य स्थापित होता है .
कुण्डलिनी की अवधारणा से आपको शिवलिंग का एक नवीन अर्थ पता चलेगा जो वास्तव में शिवलिंग के एक पुरुष जनन अंग के निरूपण से सर्वथा भिन्न है .कुण्डलिनी मेरुदंड की तंत्रिकाओं के सबसे निचले छोर पर अवस्थित सर्प के समान कुंडलित सुशुप्त शक्ति है जो एक अतिसूक्ष्म लिंग से तीन और आधा (साढे तीन)वलय बनाती हुई लिपटी हुई है।नियमानुसार बनाए हुए शिवलिंग में यही ३+१/२ कुंडली मारकर बैठा हुआ सर्प कुण्डलिनी शक्ति का प्रतीक है .



कुण्डलिनी के बारे में कुछ और जानिए मेरी अगली पोस्ट में .

1 comment:

Dr Prabhat Tandon said...

अगली पोस्ट की प्रतीक्षा रहेगी ..