भारत में चेतना पर विमर्श की प्राचीन परम्परा रही है । कुछ बात है यहाँ की मिट्टी में जो एक आध्यात्मिक प्रेरणा से लबरेज़ है । यह प्रेरणा सत्य की खोज का एक उत्प्रेरक बन जाती है । पतंजली का इस विषय पर किया गया कार्य अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यहाँ एक बात उल्लेखनीय है कि भारतीय दर्शन की विभिन्न शाखाओं में कभी -कभी अन्तर करना कठिन हो जाता है । क्योंकि यहाँ विकास पाश्चात्य दर्शन की तरह क्रमबद्ध रूप से विकसित नहीं हुआ ,यहाँ तो सब शाखाएं समानांतर चलती हैं । यद्यपि सभी में कुछ मूल विशेषताएं हैं लेकिन जुड़ाव अधिक प्रबल है ।
सांख्य का वेदान्त पर गहरा प्रभाव है । सूक्ष्मता से देखने पर ठीक ऐसा ही प्रभाव पतंजलि का बौद्ध एवं जैन दर्शन पर देखा जा सकता है । पतंजलि तो केवल एक प्रतिनिधि नाम है इसका श्रेय तो प्राचीन काल से चले आ रहे मनीषियों के संयुक्त प्रयासों को जाता है ।
भारतीय दर्शन या पतंजलि 'चित्' अथवा चेतना के बारे में क्या कहते हैं इस पर आगे अलग से विचार किया जाएगा ,हम यहाँ चेतना की प्रकृति और उसे जानने में आने वाली समस्या पर चर्चा करेंगे ।
Sunday, March 2, 2008
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