Wednesday, November 12, 2008

नास्तिक और सन्यासी -लघुकथा

ईश्वर क्या है मैं नहीं जानता ,जिसे कभी देखा नहीं, जाना नहीं ,कभी महसूस नही किया ,लोगों से सुना है बस । उसे कैसे मान लूँ ?...उसने सन्यासी को जवाब दिया .
क्या तुमने सचमुच उसे कभी अनुभव नहीं किया ?कभी किसी रिश्ते में, माँ के स्नेह या पिता की सुरक्षा में ........?सन्यासी ने पूछा ।
हाँ मैंने माँ और बाबूजी को देखा है उनका प्रेम अनुभव किया है लेकिन इससे ईश्वर का क्या सम्बन्ध ?
अच्छा तुम मेरे बार में क्या सोचते हो, एक ऐसे लक्ष्य के लिए मैंने अपना सारा जीवन निकाल दिया जिसका तुम्हारे लिए कोई अस्तित्व नहीं,कहीं तुम सन्यास को जीवन से पलायन तो नहीं मान रहे ?...
वह कुछ बोलते बोलते रुक गया , शायद उसकी नम्रता ने रोक लिया ,फ़िर कहा मैं यह नहीं कहता की ईश्वर नहीं है मैं कहता हूँ की मैं नहीं जानता ,और शायद यह जानना मेरे लिए जरूरी भी नहीं । अगर वह है तो होगा और नहीं तो नहीं । मुझे उससे क्या?
आप के विचारों ने या विश्वास ने आपको सन्यासी बनाया ,आप कुछ मानने या न मानने के लिए स्वतंत्र हैं ।
सन्यासी -फ़िर तुम मुझसे क्या चाहते हो ?
मैं जानना चाहता हूँ की मैं क्या करूँ ?जीवन का उद्देश्य क्या है,मैं आख़िर हूँ कौन। ये नश्वर दुनिया बहुत निरर्थक लगती है ,कभो कभी मुझे मेरे होने पर ही शक होने लगता है ।
तो तुम्हें लगता है की मैं तुम्हारे सवालों के जवाब दे सकता हूँ ।
पता नहीं ,शायद............. ।

तुम्हें पता है ।
क्या ?
यही की तुम क्या चाहते हो ?
नहीं मैं नहीं जानता ।
तुम्हें एक आश्वासन चाहिए की तुम्हारा जीवन इतना निरर्थक और असुरक्षित नहीं जितना तुम महसूस करते हो ।
मतलब मैं कायर हूँ ।
इतनी कायरता तो सभी में होती है ।
तो फ़िर मैं करूँ क्या ?
यह भी तुम्हें पता है ,शायद तुम मेरी आड़ लेना चाहते हो ?
कैसी आड़ ?
तुम चाहते हो कि मैं तुम्हें ईश्वर के नाम की शरण दूँ ,तुम्हें आस्तिक बना दूँ ।
सन्यासी ने बड़ी दृढ़ता से उसकी आंखों में झांक कर कहा ।
अब उससे नज़रें मिलाते न बनी अन्दर एक भीषण टीस उसे कचोट रही थी ।भीतर के घोर सन्नाटे को वह बड़ी तीव्रता से महसूस कर रहा था । उससे और कुछ कहते न बना ।धीरे से उठकर बिना कुछ कहे चल पड़ा । अब उसे ईश्वर का अनुभव होने लगा था ,शायद उसके कदम छद्म आस्तिकता की तरफ़ बढ़ रहे थे ,भय का देवता उसके ह्रदय में उतर चुका था । एक व्यक्तित्व का विनाश शुरू हो चुका था । सत्य की स्वीकार्यता और जीवन की भयावहता में भय जीत चुका था ।
.......................सन्यासी ने ऐसा तो नहीं चाहा था ।

1 comment:

कडुवासच said...

... एक सुन्दर और अलग {डिफरेंट} प्रभावशाली अभिव्यक्ति है।