Monday, November 24, 2008

छोटू -लघुकथा

छोटू इसे काम सिखा दे .रेस्टोरेंट के मालिक ने कहा .उसने एक नया लड़का रखा था काम पर।
तेरा नाम क्या है छोटू ने पूछा? बिट्टू .उसने जवाब दिया ।
यूँ तो छोटू का भी एक नाम था,लेकिन अब देर सबेर बिट्टू को भी छोटू बन जाना है ।
चाय की हर गुमठी या रेस्टोरेंट में छोटू होते हैं ।
सुन, ये चाय उस टेबल पर दे आ . तभी उसने एक नीली टीशर्ट वाले आदमी को देखा ।
उसने बिट्टू को रोक लिया,रुक मैं ही दे कर आता हूँ .नीली टीशर्ट वाले आदमी ने उसे कुछ कमीनगी वाली नज़रों से देखा ,अजगर की जकड़न बन गईं थीं वो नज़रें ।
छोटू ने एक नज़र उसे देखा फ़िर नज़रें एक तरफ़ कर दी,नज़रों के भाव तो उसने छुपा लिए लेकिन चेहरा घ्रणा से भर गया था जिसे किसी ने नहीं देखा ।
कोई देख भी नही सकता ,क्योंकि सब छोटुओं के चेहरे एक जैसे होते हैं,अपने में गुम, निराश से ।
वापस आकर उसने नए लड़के से कहा तू उस आदमी से दूर रहना.लड़के को बात समझ न आई ,
उसने बड़ी मासूमियत से पूछा -क्यों ?
छोटू अन्दर ही अन्दर कांप उठा था लेकिन उसके पथराये से चेहरे ने जैसे उसके अन्दर की आंधी को बाहर छलकने से रोक लिया था ।
पता नहीं उसकी दूर देखती हुई आंखों में क्या था,बीते समय की नाइंसाफी या भविष्य के अंधकार में छिपने की कोई जगह .

1 comment:

bankebihari said...

बहुत सुन्दर