
आदम और हव्वा के दृष्टान्त से पता चलता है कि स्त्री और पुरूष हमेशा से ही अलग विशेषताओं वाले रहे हैं। पुरूष की लम्पटता हमेशा कुख्यात रही है ,लेकिन स्त्री क्या है यह एक बेहद विवाद्दस्पद प्रश्न है। एक अजीब लेकिन दिलचस्प सा रहस्य का आवरण है उसके चारों ओर। स्त्री की कामना को कभी बहुत बढ़ा चढाकर पेश किया जाता है तो कभी पाकीजगी की चादर में ढँक कर ।
पुरूष स्वछन्द रह सकता है। उसकी स्वभावगत आक्रामकता उसे अक्सर ज़ाहिर कर देती है । लेकिन स्त्री के साथ ऐसा नही है ।कौन समझेगा त्रिया चरित्र?सुना है औरत का ह्रदय अथाह सागर जैसा होता है जिसमें न जाने कितने राज़ दफन रहते हैं ।
लेकिन जहाँ तक यौन संबंधों कि बात है पुरूष निर्दोष ही बना रहता है, आँचल औरत का ही मैला होता है ।पुरूष की अपार लम्पटता देखें , पत्नी उसकी निजी संपत्ति है लेकिन पराई स्त्रियों से रोमांस उसका अनन्य अधिकार है । हालाँकि इस तरह का कोई भी 'अधिकार' व्यवहार में 'अनन्य' नहीं हो सकता,क्योंकि दूसरे पुरूष कहाँ जायेंगे?
स्त्री का ह्रदय न जाने कितनी कल्पनाएँ करता है लेकिन वह किसी से कहती नहीं ,अपनी विश्वसनीय सखी से भी नहीं ।कामुकता का कोई मीटर तो होता नहीं और न ही शोध इस बात को प्रमाणित करते है कि स्त्री कि कामुकता पुरूष से ज्यादा होतो है ,लेकिन कुछ ग्रंथों में (अप्रमाणिक रूप से )इसे सात या शायद कहीं पर सत्तर गुनी कहा गया है ।मैं समझता हूँ ऐसा इसलिए है कि पुरूष अपनी 'आदर्श नारी' को पहल करते हुए या अपने से ज्यादा उन्मादित नहीं देख सकता । उसे एक तीव्र भय सताने लगता है कि कहीं स्त्री का ये उन्माद उसकी(पुरूष की) संतुष्ट करने की क्षमता से परे न निकल जाए । इसलिए वह इस तरह की तमाम बातें गढ़ लेता है।
अभी एक अध्ययन में यह पता चला है कि पुरुषों के मुकाबले महिलाएं पॉर्न सर्फिंग(अश्लील वेबसाइट देखना) बहुत कम करती हैं । इससे तो यही ज़ाहिर होता है कि एकांत में भी जब महिलाएं अपनी स्वाभाविकता में होती हैं तब भी पुरुषों के मुकाबले ज्यादा सहज और कम आतुर होती हैं ।
स्त्री का प्रेम स्वाभाविक ममत्व लिए होता है। एक बलिष्ठ समृद्ध और खूबसूरत नौजवान जहाँ उसके मन में उमंगें पैदा करता है वहीँ दूसरी तरफ़ वह वफ़ा और समर्पण करने वाले साधारण शक्ल सूरत वाले प्रेमी को खुशी से अपना लेती है।पुरूष को ऐसा करने में अतिरिक्त प्रयास करना पड़ता है,वह सौंदर्य का उपासक होता है । लेकिन बौद्धिक प्रेम के मामले में स्त्री पीछे रह जाती है ।पुरूष का प्रेम ज्यादा सघन (intense)होता है ,मैं ऐसा समझता हूँ । स्त्री स्टिमुलेशन पर चलती है ,यानि अन्दर से आने वाली भावनाओं से ।उत्तेजना में उसका प्रेम ज्यादा उमड़ता है। लेकिन पुरूष में प्रेम की अनवरत मिठास हमेशा रहती है । स्त्री का प्रेम सुरक्षा की भावना से ज्यादा जुड़ा रहता है ,लेकिन पुरूष विशुद्ध प्रेम की छाँव चाहता है । पुरूष का प्रेम उसे बुद्ध जैसा तपस्वी बना देता है। ..............यह अपार करुणा से उत्पन्न हुआ प्रेम नहीं तो और क्या है जिसने एक राजकुमार को सत्य की खोज की निर्मम राह पर अग्रसर किया ।उस 'निर्ममता' में कितना प्रेम था! बात कुछ विषय से हटती हुई सी मालूम होती है लेकिन ज़रा गौर से सोचें । क्या स्त्री का प्रेम कभी इतनी ऊंचाई पर पहुँच सकता है ?

3 comments:
ओह डीयर, बौद्धिक प्रेम भी कुछ होता है? मैं श्योर नहीं हो पाता।
आप चैतन्य/चैत्य पर लिख रहे थे - वह अच्छा लगा। सामान्यत: ब्लॉग पर उस विषय को कोई उठाता नहीं है।
(And it would be better if you could do away with word verification)
जिसे तुम प्यार कहते हो शायद मेरी नजर मे यह प्यार नही है. लेकिन....
क्या स्त्री का प्रेम कभी इतनी ऊंचाई पर पहुँच सकता है... तो इस का जबाब है मीरा, राधा, यह एक प्रेम ही था जिसे आज कल थोडा अलग नजर से देखा ओर समझा जाता है, फ़िर एक मां का प्यार.... मां भी तो एक स्त्री ही है ना, भाई स्त्री का प्रेम तो हमेशा ही हर रुप मे समान योग ओर ऊंचाई पर ही होता है.
धन्यवाद
राज भाटिया जी मैंने प्यार की परिभाषा कहाँ दी है ?मैंने तो कामना शब्द का प्रयोग किया है. मैंने तो केवल एक पहलू की ओर इशारा किया है कि औरत की कामना का उसके प्रेम पर कैसा असर पड़ता है . प्रेम पर तो कई ग्रन्थ लिख डालें तो भी कम पड़े .बात अभी पूरी कहाँ हुई.फ़िर भी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद.
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